हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, मरहूम आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी ने अपनी एक कृति में "मनुष्यों के पथभ्रष्ट होने की जड़" के विषय पर चर्चा की है, जो प्रिय पाठको के सम्मुख प्रस्तुत की जा रही है।
पवित्र कुरान (सूर ए आराफ, आयत 176) में है:
«اَخْلَدَ اِلَی اْلاَرْضِ وَ اتَّبَعَ هَواه»
अनुवाद: "लेकिन वह (हमने उसे रास्ता चुनने की मानवीय स्वतंत्रता के सिद्धांत के अनुसार स्वतंत्र छोड़ दिया, और वह) नीचता की ओर झुक गया, धरती से चिपक गया और अपनी इच्छा का पालन करने लगा।"
मनुष्य के सभी विचलनों की जड़ और ईश्वर की आज्ञाकारिता एवं बंदगी में मुख्य समस्या हवस परस्ती ही है। अन्यथा, पैगंबरों की आज्ञाकारिता जहाँ मनुष्य की इच्छा और चाहत के अनुरूप हो, वहाँ कोई बड़ी बात नहीं है और मनुष्य को उससे कोई ऐतराज़ भी नहीं होता। असली बात वहाँ है जहाँ उसकी खिंचाव विपरीत दिशा में हो। ऐसे में उसे सही रास्ता चुनना चाहिए, सही प्रवृत्ति को मजबूत करना चाहिए, और अपनी इच्छा से उसे प्राथमिकता देकर नफ्स पर नियंत्रण करना चाहिए, ताकि इस माध्यम से वह अपने मूल्य को प्रकट कर सके।
हवाए नफ्सानी से लड़ने का तरीक़ा यह है कि उनके मुकाबले में दूसरी खिंचाव पैदा की जाएँ और उन्हें मजबूत करके उन पर विजय प्राप्त की जाए। वरना जब तक ये इच्छाएँ हमारे नफ्स के अखाड़े की एकलौती सवार बनी रहेंगी, तब तक कुछ नहीं किया जा सकता - बल्कि हम उनके सामने पराजित हो जाएँगे और प्रतिरोध करना भी संभव नहीं होगा।
बेशक, ये सहायक इच्छाएँ मूल रूप से हमारी फ़ितरत में मौजूद हैं, लेकिन वे सुप्त और प्रभावहीन हैं। ज़रूरत है कि हम उन्हें सक्रिय करें और आक्रामक इच्छाओं और हवाओं के मुकाबले खड़ा करें।
स्रोत: अख़लाक़ दर कुरान, भाग 1, पेज 185
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